The Vision of Śiva· 7.61 / 122

The Vision of Śiva7.61

7.61
दिव्यानि तान्ययत्नेन प्रसरन्ति समन्ततः । सामस्त्येन प्रसर्पन्तो निर्विशेषा हि केवलाः ॥६१॥
divyāni tānyayatnena prasaranti samantataḥ | sāmastyena prasarpanto nirviśeṣā hi kevalāḥ
— दिव्य (सृष्टियाँ) ; — वे ; — अयत्नपूर्वक ; — प्रसृत होती हैं ; — सर्वत्र (चारों ओर) ; — सामस्त्य (समग्रता) से ; — प्रसर्पित (फैलती) हुई ; — निर्विशेष (भेदरहित) ; — निश्चय ही ; — केवल (विशुद्ध)

वे दिव्य (सृष्टियाँ) अयत्नपूर्वक (बिना प्रयास के) सर्वत्र चारों ओर प्रसृत होती हैं; सामस्त्य (समग्रता) से प्रसर्पित (फैलती) हुई वे निश्चय ही निर्विशेष (भेदरहित) तथा केवल (विशुद्ध) हैं।