दिव्यानि तान्ययत्नेन प्रसरन्ति समन्ततः ।
सामस्त्येन प्रसर्पन्तो निर्विशेषा हि केवलाः ॥६१॥
divyāni tānyayatnena prasaranti samantataḥ |
sāmastyena prasarpanto nirviśeṣā hi kevalāḥ
वे दिव्य (सृष्टियाँ) अयत्नपूर्वक (बिना प्रयास के) सर्वत्र चारों ओर प्रसृत होती हैं; सामस्त्य (समग्रता) से प्रसर्पित (फैलती) हुई वे निश्चय ही निर्विशेष (भेदरहित) तथा केवल (विशुद्ध) हैं।