अभिमानात्तथैवैषां भावसर्गः प्रवर्तते ।
प्रत्येकदेवग्रामस्य ममताभिनिवेशतः ॥६०॥
abhimānāttathaivaiṣāṃ bhāvasargaḥ pravartate |
pratyekadevagrāmasya mamatābhiniveśataḥ
(ऐसे) अभिमान (आत्म-तादात्म्य) से, उसी प्रकार इन (साधकों) के लिए भाव-सर्ग (पदार्थों की सृष्टि) प्रवृत्त होती है — प्रत्येक देव-ग्राम (देवताओं के समूह) के विषय में 'यह मेरा है' इस ममता के अभिनिवेश (दृढ़ निश्चय) से।