The Vision of Śiva· 7.60 / 122

The Vision of Śiva7.60

7.60
अभिमानात्तथैवैषां भावसर्गः प्रवर्तते । प्रत्येकदेवग्रामस्य ममताभिनिवेशतः ॥६०॥
abhimānāttathaivaiṣāṃ bhāvasargaḥ pravartate | pratyekadevagrāmasya mamatābhiniveśataḥ
— अभिमान (आत्म-तादात्म्य) से ; — उसी प्रकार ; — इन (साधकों) के ; — भाव-सर्ग (पदार्थों की सृष्टि) ; — प्रवृत्त होती है ; — प्रत्येक देव-ग्राम के ; — 'यह मेरा' इस ममता के अभिनिवेश से

(ऐसे) अभिमान (आत्म-तादात्म्य) से, उसी प्रकार इन (साधकों) के लिए भाव-सर्ग (पदार्थों की सृष्टि) प्रवृत्त होती है — प्रत्येक देव-ग्राम (देवताओं के समूह) के विषय में 'यह मेरा है' इस ममता के अभिनिवेश (दृढ़ निश्चय) से।