The Vision of Śiva· 6.92 / 126

The Vision of Śiva6.92

6.92
कुण्डलादिषु भावेषु सर्वथैव सुवर्णता । व्याप्तेरखण्डितैवास्ते शिवता सर्वगामिनी ॥९२॥
kuṇḍalādiṣu bhāveṣu sarvathaiva suvarṇatā | vyāpterakhaṇḍitaivāste śivatā sarvagāminī
— कुण्डल आदि में ; — भावों में ; — सर्वथा ही ; — सुवर्णता ; — व्याप्ति के कारण ; — अखण्डित ही ; — रहती है ; — शिवता ; — सर्वगामिनी

कुण्डल आदि भावों में सर्वथा ही (वही एक) सुवर्णता (विद्यमान) रहती है; (उसी प्रकार) सर्वगामिनी शिवता अपनी व्याप्ति के कारण अखण्डित ही (समस्त भावों में) अवस्थित रहती है।