कुण्डलादिषु भावेषु सर्वथैव सुवर्णता ।
व्याप्तेरखण्डितैवास्ते शिवता सर्वगामिनी ॥९२॥
kuṇḍalādiṣu bhāveṣu sarvathaiva suvarṇatā |
vyāpterakhaṇḍitaivāste śivatā sarvagāminī
कुण्डल आदि भावों में सर्वथा ही (वही एक) सुवर्णता (विद्यमान) रहती है; (उसी प्रकार) सर्वगामिनी शिवता अपनी व्याप्ति के कारण अखण्डित ही (समस्त भावों में) अवस्थित रहती है।