The Vision of Śiva· 6.93 / 126

The Vision of Śiva6.93

6.93
सर्वज्ञानातिरेकत्वे स्थिते वक्ष्यसि किं स्वके । दर्शने यत्र नानात्वं बन्धमोक्षावुदाहृतौ ॥९३॥
sarvajñānātirekatve sthite vakṣyasi kiṃ svake | darśane yatra nānātvaṃ bandhamokṣāvudāhṛtau
— सबकी ज्ञान से अतिरेक-रहितता ; — सिद्ध होने पर ; — आप क्या कहेंगे ; — अपने दर्शन में ; — जहाँ ; — नानात्व ; — बन्ध और मोक्ष ; — प्रतिपादित हैं

(आक्षेप:) जब सबकी ज्ञान से अतिरेक-रहितता (अभिन्नता) सिद्ध हो चुकी, तब अपने ही दर्शन (मत) में आप क्या कहेंगे — जहाँ नानात्व (अनेकता) तथा बन्ध और मोक्ष (भी) प्रतिपादित हैं?