सर्वज्ञानातिरेकत्वे स्थिते वक्ष्यसि किं स्वके ।
दर्शने यत्र नानात्वं बन्धमोक्षावुदाहृतौ ॥९३॥
sarvajñānātirekatve sthite vakṣyasi kiṃ svake |
darśane yatra nānātvaṃ bandhamokṣāvudāhṛtau
(आक्षेप:) जब सबकी ज्ञान से अतिरेक-रहितता (अभिन्नता) सिद्ध हो चुकी, तब अपने ही दर्शन (मत) में आप क्या कहेंगे — जहाँ नानात्व (अनेकता) तथा बन्ध और मोक्ष (भी) प्रतिपादित हैं?