The Vision of Śiva· 6.10 / 126

The Vision of Śiva6.10

6.10
यस्यां प्रतीतौ नेत्यस्य प्रसरो न प्रवर्तते । तद्ब्रह्मेति वदन्त्येक ये स्फुलिंगात्मवादिनः ॥१०॥
yasyāṃ pratītau netyasya prasaro na pravartate | tadbrahmeti vadantyeka ye sphuliṃgātmavādinaḥ
— जिस प्रतीति में ; — 'नेति' (न-यह) का ; — प्रसार ; — नहीं चलता ; — वह ब्रह्म ; — ऐसा ; — कहते हैं ; — कुछ ; — जो ; — स्फुलिंग-आत्म-वादी

'जिस प्रतीति में 'नेति' (न-यह) का प्रसार नहीं चलता, वह ब्रह्म है' — ऐसा कुछ कहते हैं; और जो स्फुलिंग-आत्म-वादी (आत्मा को ब्रह्म की चिनगारी मानने वाले) हैं।