क्व पाणिपादं क्व शिरो यथैक्यं भिन्नदेशगम् ॥६३॥
kva pāṇipādaṃ kva śiro yathaikyaṃ bhinnadeśagam
कहाँ हाथ-पैर, कहाँ सिर! — जैसे (एक शरीर की) एकता भिन्न-भिन्न देशों में स्थित होते हुए भी (बनी रहती है, वैसे ही ईश की सर्वव्यापी भेद में अभेद-एकता है)।