The Vision of Śiva· 4.63 / 124

The Vision of Śiva4.63

4.63
क्व पाणिपादं क्व शिरो यथैक्यं भिन्नदेशगम् ॥६३॥
kva pāṇipādaṃ kva śiro yathaikyaṃ bhinnadeśagam
— कहाँ ; — हाथ-पैर ; — कहाँ ; — सिर ; — जैसे ; — एकता ; — भिन्न-भिन्न देशों में स्थित

कहाँ हाथ-पैर, कहाँ सिर! — जैसे (एक शरीर की) एकता भिन्न-भिन्न देशों में स्थित होते हुए भी (बनी रहती है, वैसे ही ईश की सर्वव्यापी भेद में अभेद-एकता है)।