नाशः कटकरूपेण सद्भावः कुण्डलादिना ॥५४॥
nāśaḥ kaṭakarūpeṇa sadbhāvaḥ kuṇḍalādinā
नाश तो कटक-रूप (कड़े के रूप) में (होता है, अर्थात् कड़े का रूप मिटता है), (किन्तु उसी सोने की) सत्ता कुण्डल आदि के रूप में (बनी रहती है — द्रव्य न नष्ट होता है न नया उत्पन्न होता है)।