नैवमत्र स्वभावत्वे विरोधो बाधनात्मकः ।
स विवेकदृशा ज्ञेयो न स्वभावेन कुत्रचित् ॥२६॥
naivamatra svabhāvatve virodho bādhanātmakaḥ |
sa vivekadṛśā jñeyo na svabhāvena kutracit
यहाँ ऐसा नहीं कि (किसी वस्तु के) स्वभाव-रूप होने में बाधन-रूप विरोध (हो); वह (विरोध) तो विवेक-दृष्टि से जानने योग्य है, कहीं भी (वस्तु के) स्वभाव से नहीं।