The Vision of Śiva· 4.18 / 124

The Vision of Śiva4.18

4.18
तदान्ध्यं जन्यते केन तस्य कालान्तरस्थितेः । सर्वैः समत्वं बाधो वा संबन्धे जननं कथम् ॥१८॥
tadāndhyaṃ janyate kena tasya kālāntarasthiteḥ | sarvaiḥ samatvaṃ bādho vā saṃbandhe jananaṃ katham
— उसका अन्धत्व (अग्राहकता) ; — उत्पन्न होती है ; — किससे ; — उसकी ; — भिन्न काल में स्थित होने के कारण ; — सबके साथ ; — समता ; — बाध ; — अथवा ; — सम्बन्ध में ; — जनन ; — कैसे

उसका अन्धत्व (अग्राहकता) किससे उत्पन्न होती है, क्योंकि वह तो भिन्न काल में स्थित है (बाधक ज्ञान से)? या तो सबके साथ समता (होगी), अथवा बाध (समझाओ); और (भिन्न-काल की वस्तुओं के) सम्बन्ध में जनन कैसे (हो)?