किमर्थं गुरुशास्त्रादि चेत्तथा तदवस्थितेः ।
देवस्य शास्त्राद्बोधेन किं प्रयोजनमेव च ॥७३॥
kimarthaṃ guruśāstrādi cettathā tadavasthiteḥ |
devasya śāstrādbodhena kiṃ prayojanameva ca
(आक्षेप:) यदि (पूछो कि) 'फिर गुरु, शास्त्र आदि किसलिए?' — और इसी प्रकार, चूँकि देव (एकमात्र सत्ता रूप में) वैसा ही स्थित है, तो शास्त्र से बोध द्वारा क्या प्रयोजन?