The Vision of Śiva· 3.73 / 99

The Vision of Śiva3.73

3.73
किमर्थं गुरुशास्त्रादि चेत्तथा तदवस्थितेः । देवस्य शास्त्राद्बोधेन किं प्रयोजनमेव च ॥७३॥
kimarthaṃ guruśāstrādi cettathā tadavasthiteḥ | devasya śāstrādbodhena kiṃ prayojanameva ca
— किसलिए ; — गुरु-शास्त्र आदि ; — यदि (पूछो) ; — तदनुसार ; — उसके वैसे स्थित होने के कारण ; — देव की ; — शास्त्र से ; — बोध द्वारा ; — क्या ; — प्रयोजन ; — और भी

(आक्षेप:) यदि (पूछो कि) 'फिर गुरु, शास्त्र आदि किसलिए?' — और इसी प्रकार, चूँकि देव (एकमात्र सत्ता रूप में) वैसा ही स्थित है, तो शास्त्र से बोध द्वारा क्या प्रयोजन?