स एवेत्थं स्वेच्छयास्ते तत्कर्तृत्वेन बोध्यतः ॥७४॥
sa evetthaṃ svecchayāste tatkartṛtvena bodhyataḥ
(उत्तर:) वही (शिव) इस प्रकार अपनी इच्छा से स्थित है — उस (बोध-प्रक्रिया) के कर्ता रूप में, (तथा) बोध्य (जागने योग्य) रूप में भी।
(उत्तर:) वही (शिव) इस प्रकार अपनी इच्छा से स्थित है — उस (बोध-प्रक्रिया) के कर्ता रूप में, (तथा) बोध्य (जागने योग्य) रूप में भी।