The Vision of Śiva· 2.66 / 90

The Vision of Śiva2.66

2.66
तदानीं प्रतिपाद्यस्य किमायातं स्ववीक्षणात् । वक्तव्यमेव तस्यापि पश्यन्तीं पश्य या स्वयम् ॥६६॥
tadānīṃ pratipādyasya kimāyātaṃ svavīkṣaṇāt | vaktavyameva tasyāpi paśyantīṃ paśya yā svayam
— उस समय ; — जिसको प्रतिपादित किया जाना है उसको ; — क्या प्राप्त हुआ ; — स्व-वीक्षण से ; — कहना ही पड़ेगा ; — उसके लिए भी ; — पश्यन्ती को ; — 'देखो!' ; — जो ; — स्वयं (देखती है)

— तो उस समय जिसको (वह) प्रतिपादित की जानी है, उसको उसके स्व-वीक्षण से क्या प्राप्त हुआ? उसके लिए भी तो यही कहना पड़ेगा — 'उस पश्यन्ती को देखो, जो स्वयं (देखती है)' (— इस प्रकार अनवस्था से छुटकारा नहीं)।