तदानीं प्रतिपाद्यस्य किमायातं स्ववीक्षणात् ।
वक्तव्यमेव तस्यापि पश्यन्तीं पश्य या स्वयम् ॥६६॥
tadānīṃ pratipādyasya kimāyātaṃ svavīkṣaṇāt |
vaktavyameva tasyāpi paśyantīṃ paśya yā svayam
— तो उस समय जिसको (वह) प्रतिपादित की जानी है, उसको उसके स्व-वीक्षण से क्या प्राप्त हुआ? उसके लिए भी तो यही कहना पड़ेगा — 'उस पश्यन्ती को देखो, जो स्वयं (देखती है)' (— इस प्रकार अनवस्था से छुटकारा नहीं)।