विहाय शास्त्ररचना जातुचिन्न विराजते ।
पाण्यादीन्द्रियवन्नैतद्ब्रह्म वागिन्द्रियं भवेत् ॥१७॥
vihāya śāstraracanā jātucinna virājate |
pāṇyādīndriyavannaitadbrahma vāgindriyaṃ bhavet
(शब्द को) छोड़कर शास्त्र-रचना कभी शोभित नहीं होती; (फिर भी) हाथ आदि इन्द्रियों के समान यह वाक्-इन्द्रिय ब्रह्म नहीं हो सकती।