The Vision of Śiva· 2.17 / 90

The Vision of Śiva2.17

2.17
विहाय शास्त्ररचना जातुचिन्न विराजते । पाण्यादीन्द्रियवन्नैतद्ब्रह्म वागिन्द्रियं भवेत् ॥१७॥
vihāya śāstraracanā jātucinna virājate | pāṇyādīndriyavannaitadbrahma vāgindriyaṃ bhavet
— छोड़कर ; — शास्त्र-रचना ; — कभी ; — शोभित नहीं होती ; — हाथ आदि इन्द्रिय के समान ; — यह नहीं ; — ब्रह्म ; — वाक्-इन्द्रिय ; — हो सके

(शब्द को) छोड़कर शास्त्र-रचना कभी शोभित नहीं होती; (फिर भी) हाथ आदि इन्द्रियों के समान यह वाक्-इन्द्रिय ब्रह्म नहीं हो सकती।