The Vision of Śiva· 2.18 / 90

The Vision of Śiva2.18

2.18
अथोच्यते प्रकिर्यासौ सांख्यादिरचिता न सा । तत्त्वोन्मेषप्रसरणे भवेत्संबन्धभागिनी ॥१८॥
athocyate prakiryāsau sāṃkhyādiracitā na sā | tattvonmeṣaprasaraṇe bhavetsaṃbandhabhāginī
— अब ; — कहा जाता है ; — प्रक्रिया ; — यह ; — सांख्य आदि की रची हुई ; — वह नहीं ; — तत्त्वों के उन्मेष के प्रसरण में ; — होगी ; — सम्बन्ध-भागिनी

अब यदि कहा जाए कि 'यह प्रक्रिया (शब्द से अभिव्यक्ति) सांख्य आदि की रची हुई नहीं है; तत्त्वों के उन्मेष के प्रसरण में वह (वास्तविकता से) सम्बन्ध-भागिनी होगी' —