The Vision of Śiva· 2.19 / 90

The Vision of Śiva2.19

2.19
विमर्शानुभवेनैषा यथा वाक् प्रथमं श्रिता । लक्ष्यते बोधरूपेण न तथा चरणादिकम् ॥१९॥
vimarśānubhavenaiṣā yathā vāk prathamaṃ śritā | lakṣyate bodharūpeṇa na tathā caraṇādikam
— विमर्श के अनुभव से ; — यह ; — जैसे ; — वाक् ; — सर्वप्रथम ; — आश्रित ; — लक्षित होती है ; — बोध-रूप से ; — उस प्रकार नहीं ; — चरण (पैर) आदि

(हम उत्तर देते हैं:) जैसे यह वाक् सर्वप्रथम विमर्श के अनुभव से आश्रित होकर बोध-रूप से लक्षित होती है, वैसे चरण (पैर) आदि (इन्द्रियाँ) लक्षित नहीं होतीं।