विमर्शानुभवेनैषा यथा वाक् प्रथमं श्रिता ।
लक्ष्यते बोधरूपेण न तथा चरणादिकम् ॥१९॥
vimarśānubhavenaiṣā yathā vāk prathamaṃ śritā |
lakṣyate bodharūpeṇa na tathā caraṇādikam
(हम उत्तर देते हैं:) जैसे यह वाक् सर्वप्रथम विमर्श के अनुभव से आश्रित होकर बोध-रूप से लक्षित होती है, वैसे चरण (पैर) आदि (इन्द्रियाँ) लक्षित नहीं होतीं।