योगिनामिच्छया यद्वन्नानारूपोपपत्तिता ।
नचास्ति साधनं किंचिन्मृदादीच्छां विना प्रभोः ॥४४॥
yogināmicchayā yadvannānārūpopapattitā |
nacāsti sādhanaṃ kiṃcinmṛdādīcchāṃ vinā prabhoḥ
जैसे योगियों की इच्छा-मात्र से नाना रूपों की उत्पत्ति होती है, वैसे ही प्रभु के लिए इच्छा के बिना मिट्टी आदि कोई साधन (उपादान) नहीं है।