The Vision of Śiva· 1.44 / 49

The Vision of Śiva1.44

1.44
योगिनामिच्छया यद्वन्नानारूपोपपत्तिता । नचास्ति साधनं किंचिन्मृदादीच्छां विना प्रभोः ॥४४॥
yogināmicchayā yadvannānārūpopapattitā | nacāsti sādhanaṃ kiṃcinmṛdādīcchāṃ vinā prabhoḥ
— योगियों की ; — इच्छा से ; — जैसे ; — नाना रूपों की उत्पत्ति ; — और नहीं ; — है ; — साधन (उपादान) ; — कोई ; — मिट्टी आदि ; — इच्छा के बिना ; — प्रभु का

जैसे योगियों की इच्छा-मात्र से नाना रूपों की उत्पत्ति होती है, वैसे ही प्रभु के लिए इच्छा के बिना मिट्टी आदि कोई साधन (उपादान) नहीं है।