The Vision of Śiva· 1.45 / 49

The Vision of Śiva1.45

1.45
दृश्यन्तेऽत्र तदिच्छातो भावा भीत्यादियोगतः ॥४५॥
dṛśyante'tra tadicchāto bhāvā bhītyādiyogataḥ
— दीखते हैं ; — यहाँ ; — उसकी इच्छा से ; — भाव (वस्तुएँ) ; — भय आदि के योग से

यहाँ (जगत् में) सब भाव उसकी इच्छा से ही (उत्पन्न होते हुए) दीखते हैं — जैसे भय आदि के योग से (भ्रम-दर्शन उत्पन्न होते हैं)।