दृश्यन्तेऽत्र तदिच्छातो भावा भीत्यादियोगतः ॥४५॥
dṛśyante'tra tadicchāto bhāvā bhītyādiyogataḥ
यहाँ (जगत् में) सब भाव उसकी इच्छा से ही (उत्पन्न होते हुए) दीखते हैं — जैसे भय आदि के योग से (भ्रम-दर्शन उत्पन्न होते हैं)।
यहाँ (जगत् में) सब भाव उसकी इच्छा से ही (उत्पन्न होते हुए) दीखते हैं — जैसे भय आदि के योग से (भ्रम-दर्शन उत्पन्न होते हैं)।