The Heart of Recognition · 1.20

The Heart of Recognition 1.20

1.20
तदा प्रकाशानन्दसारमहामन्त्रवीर्यात्मकपूर्णाहन्तावेशात् सदा सर्वसर्गसंहारकारिनिजसंविद्देवताचक्रेश्वरताप्राप्तिर्भवतीति शिवम् ॥२०॥
tadā prakāśānanda-sāra-mahā-mantra-vīryātmaka-pūrṇāhantā-veśāt sadā sarva-sarga-saṃhāra-kāri-nija-saṃvid-devatā-cakreśvaratā-prāptir bhavatīti śivam
sūtra
— तब ; — जिसका सार प्रकाश और आनन्द है ; — महामन्त्र (अहम्) के वीर्य से युक्त ; — पूर्ण अहन्ता में आवेश (प्रवेश) से ; — सदा समस्त सृष्टि और संहार करने वाले ; — अपने ही संविद्-देवता-चक्र की ईश्वरता (स्वामित्व) की प्राप्ति ; — होती है ; — इति शिवम् — इस प्रकार सर्वत्र मंगल हो

तब प्रकाश और आनन्द जिसका सार है तथा महामन्त्र (अहम्) का वीर्य जिसका स्वरूप है — ऐसी पूर्ण अहन्ता के आवेश से, सदा समस्त सृष्टि-संहार करने वाले अपने ही संविद्-देवता-चक्र की ईश्वरता की प्राप्ति होती है — इति शिवम् (इस प्रकार सर्वत्र मंगल हो)।