The Heart of Recognition · 1.14

The Heart of Recognition 1.14

1.14
चितिवह्निरवरोहपदे छन्नोऽपि मात्रया मेयेन्धनं प्लुष्यति ॥१४॥
citi-vahnir avaroha-pade channo 'pi mātrayā meyendhanaṃ pluṣyati
sūtra
— चिति-रूप अग्नि ; — अवरोह-दशा में (बद्ध अवस्था में) ; — आच्छन्न, ढकी हुई होकर भी ; — भी, तथापि ; — आंशिक रूप से ; — ज्ञेय-रूपी ईंधन को ; — जलाती है, भस्म करती है

चिति-रूप अग्नि अवरोह-दशा (बद्ध अवस्था) में आच्छन्न (ढकी) होते हुए भी आंशिक रूप से ज्ञेय-रूपी ईंधन को जलाती रहती है।