The Heart of Recognition · 1.13

The Heart of Recognition 1.13

1.13
तत्परिज्ञाने चित्तमेव अन्तर्मुखीभावेन चेतनपदाध्यारोहाच्चितिः ॥१३॥
tat-parijñāne cittam eva antarmukhī-bhāvena cetana-padādhyārohāc citiḥ
sūtra
— उस (स्वस्वरूप) का पूर्ण परिज्ञान होने पर ; — चित्त (सीमित मन) ; — ही, स्वयं ; — अन्तर्मुख होकर ; — (स्वतन्त्र) चेतन-पद पर आरोहण करने से ; — चिति (परम चैतन्य) बन जाता है

उस (स्वस्वरूप) का पूर्ण परिज्ञान होने पर चित्त ही अन्तर्मुख होकर चेतन-पद पर आरूढ़ होकर चिति (परम चैतन्य) बन जाता है।