Verses on the Recognition of the Lord· 15.18 / 18

Verses on the Recognition of the Lord15.18

15.18
जनस्यायत्नसिद्ध्यर्थम् उदयाकरसूनुना ईश्वरप्रत्यभिज्ञेयम् उत्पलेनोपपादिता ॥१८॥
janasyāyatnasiddhyartham udayākarasūnunā īśvarapratyabhijñeyam utpalenopapāditā
— लोगों की, मनुष्यों के लिए ; — अनायास (बिना अधिक प्रयत्न के) सिद्धि के लिए ; — उदयाकर के पुत्र के द्वारा ; — ईश्वर-प्रत्यभिज्ञा (यह ग्रन्थ) ; — यह ; — उत्पल(देव) के द्वारा ; — प्रतिपादित की गई, स्थापित की गई (भूत कृदन्त)

लोगों की अनायास (बिना अधिक प्रयत्न के) सिद्धि के लिए, उदयाकर के पुत्र उत्पल(देव) के द्वारा यह ईश्वर-प्रत्यभिज्ञा प्रतिपादित की गई है।