Verses on the Recognition of the Lord· 13.9 / 11

Verses on the Recognition of the Lord13.9

13.9
यश् च प्रमाता शून्यादिः प्रमेये व्यतिरेकिणि माता स मेयः सन् कालादिकपञ्चकवेष्टितः ॥९॥
yaś ca pramātā śūnyādiḥ prameye vyatirekiṇi mātā sa meyaḥ san kālā-dikapañcakaveṣṭitaḥ
— जो ; — और ; — प्रमाता ; — शून्य आदि (रूप) ; — ज्ञेय (प्रमेय) के (खड़े होने पर) ; — व्यतिरिक्त (भिन्न रूप में खड़े होने पर) ; — माता — ज्ञाता ; — वह ; — मेय — ज्ञेय ; — होते हुए (√अस्, वर्तमान कृदन्त) ; — काल आदि पाँच (कञ्चुकों) से वेष्टित (आवृत)

और जो शून्य आदि प्रमाता, जब ज्ञेय (प्रमेय) व्यतिरिक्त (भिन्न) रूप में खड़ा होता है, माता (ज्ञाता) होते हुए भी स्वयं ज्ञेय (मेय) होकर, काल आदि पाँच (कञ्चुकों) से वेष्टित (आवृत) रहता है।