न हि स्वात्मैकनिष्ठानाम् अनुसन्धानवर्जिनाम्
सदसत्तापदे ऽप्य् एष सप्तम्यर्थः प्रकल्प्यते ॥१५॥
na hi svātmaikaniṣṭhānām anusandhānavarjinām
sadasattāpade 'py eṣa saptamyarthaḥ prakalpyate
— क्योंकि नहीं; — अपने ही आत्मा में एकमात्र निष्ठ (वस्तुओं) के; — अनुसन्धान से रहित (वस्तुओं) के; — सत्-असत् की स्थिति में (पद में); — भी; — यह; — सप्तमी (अधिकरण) का अर्थ ('इसके होने पर'); — घटता है, बनता है (कर्मवाच्य, √कॢप्+प्र)
क्योंकि अपने ही आत्मा में एकमात्र निष्ठ तथा अनुसन्धान से रहित (वस्तुओं) के लिए, सत्-असत् की स्थिति में भी, यह सप्तमी (अधिकरण) का अर्थ नहीं बनता।