Verses on the Recognition of the Lord· 12.15 / 21

Verses on the Recognition of the Lord12.15

12.15
न हि स्वात्मैकनिष्ठानाम् अनुसन्धानवर्जिनाम् सदसत्तापदे ऽप्य् एष सप्तम्यर्थः प्रकल्प्यते ॥१५॥
na hi svātmaikaniṣṭhānām anusandhānavarjinām sadasattāpade 'py eṣa saptamyarthaḥ prakalpyate
— क्योंकि नहीं ; — अपने ही आत्मा में एकमात्र निष्ठ (वस्तुओं) के ; — अनुसन्धान से रहित (वस्तुओं) के ; — सत्-असत् की स्थिति में (पद में) ; — भी ; — यह ; — सप्तमी (अधिकरण) का अर्थ ('इसके होने पर') ; — घटता है, बनता है (कर्मवाच्य, √कॢप्+प्र)

क्योंकि अपने ही आत्मा में एकमात्र निष्ठ तथा अनुसन्धान से रहित (वस्तुओं) के लिए, सत्-असत् की स्थिति में भी, यह सप्तमी (अधिकरण) का अर्थ नहीं बनता।