Verses on the Recognition of the Lord· 1.5 / 5

Verses on the Recognition of the Lord1.5

1.5
तत्र ज्ञानं स्वतःसिद्धं क्रिया कायाश्रिता सती परैर् अप्य् उपलक्ष्येत तयान्यज्ञानम् ऊह्यते ॥५॥
tatra jñānaṃ svataḥsiddhaṃ kriyā kāyāśritā satī parair apy upalakṣyeta tayānyajñānam ūhyate
— इन दोनों में ; — ज्ञान ; — स्वतः सिद्ध, स्वयं-प्रमाणित ; — क्रिया ; — शरीर पर आश्रित ; — होती हुई, होने के कारण (√अस्, वर्तमान कृदन्त) ; — दूसरों के द्वारा ; — भी, यहाँ तक कि ; — उपलक्ष्येत — देखी जा सकती है (विधि, कर्मवाच्य) ; — उसके द्वारा (क्रिया से) ; — अन्य का ज्ञान ; — ऊह्यते — अनुमान किया जाता है (कर्मवाच्य)

इन दोनों में ज्ञान स्वतः सिद्ध है; क्रिया, शरीर पर आश्रित होने के कारण, दूसरों के द्वारा भी देखी जा सकती है, और उसी से अन्य के ज्ञान का अनुमान किया जाता है।