Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 9.27 / 35

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)9.27

9.27
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति । तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥ ९-२७ ॥
patraṃ puṣpaṃ phalaṃ toyaṃ yo me bhaktyā prayacchati | tadahaṃ bhaktyupahṛtamaśnāmi prayatātmanaḥ || 9-27 ||
— पत्र, पुष्प, फल, जल ; — जो मुझे भक्ति से अर्पित करता है ; — उस भक्तिपूर्वक अर्पित को ; — मैं ग्रहण करता हूँ, शुद्धचित्त वाले के

जो मुझे भक्ति से पत्र, पुष्प, फल या जल अर्पित करता है, उस शुद्धचित्त वाले के भक्तिपूर्वक अर्पित उस (अर्पण) को मैं ग्रहण करता हूँ।