Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 8.6 / 28

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)8.6

8.6
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् । तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥ ८-६ ॥
yaṃ yaṃ vāpi smaranbhāvaṃ tyajatyante kalevaram | taṃ tamevaiti kaunteya sadā tadbhāvabhāvitaḥ || 8-6 ||
— अथवा जिस भाव का स्मरण करता हुआ ; — अन्त में शरीर त्यागता है ; — उसी को प्राप्त होता है, हे कुन्तीपुत्र ; — सदा उसी भाव से भावित

हे कुन्तीपुत्र, अन्त में शरीर त्यागते समय जिस-जिस भाव का स्मरण करता हुआ मनुष्य देह त्यागता है, उसी-उसी को वह प्राप्त होता है, क्योंकि वह सदा उसी भाव से भावित रहता है।