Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 8.5 / 28

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)8.5

8.5
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् । यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥ ८-५ ॥
antakāle ca māmeva smaranmuktvā kalevaram | yaḥ prayāti sa madbhāvaṃ yāti nāstyatra saṃśayaḥ || 8-5 ||
— और अन्तकाल में मुझे ही ; — स्मरण करता हुआ शरीर छोड़कर ; — जो प्रयाण करता है, वह मेरे भाव को ; — प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं

और जो अन्तकाल में मुझे ही स्मरण करता हुआ शरीर को छोड़कर प्रयाण करता है, वह मेरे भाव को प्राप्त होता है; इसमें कोई संशय नहीं।