Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 8.4 / 28

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)8.4

8.4
अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् । अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥ ८-४ ॥
adhibhūtaṃ kṣaro bhāvaḥ puruṣaścādhidaivatam | adhiyajño'hamevātra dehe dehabhṛtāṃ vara || 8-4 ||
— अधिभूत क्षरणशील भाव ; — और पुरुष अधिदैव ; — अधियज्ञ मैं ही यहाँ ; — देह में, हे देहधारियों में श्रेष्ठ

हे देहधारियों में श्रेष्ठ, क्षरणशील (नाशवान्) भाव अधिभूत है, और पुरुष अधिदैव है; और इस देह में अधियज्ञ मैं ही हूँ।