Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 8.3 / 28

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)8.3

8.3
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते । भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥ ८-३ ॥
akṣaraṃ brahma paramaṃ svabhāvo'dhyātmamucyate | bhūtabhāvodbhavakaro visargaḥ karmasaṃjñitaḥ || 8-3 ||
— परम अक्षर ब्रह्म ; — स्वभाव अध्यात्म कहलाता है ; — भूतों के भाव की उत्पत्ति करने वाला ; — विसर्ग कर्म नाम वाला

परम अक्षर ब्रह्म है; अपना स्वभाव (स्व-स्वरूप) अध्यात्म कहलाता है; और भूतों के भाव की उत्पत्ति करने वाला विसर्ग (सृष्टि-रूप त्याग) कर्म कहलाता है।