Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 6.8 / 49

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)6.8

6.8
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः । युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥ ६-८ ॥
jñānavijñānatṛptātmā kūṭastho vijitendriyaḥ | yukta ityucyate yogī samaloṣṭāśmakāñcanaḥ || 6-8 ||
— ज्ञान-विज्ञान से तृप्त आत्मा वाला ; — कूटस्थ, जितेन्द्रिय ; — युक्त कहलाता है योगी ; — जिसके लिए ढेला, पत्थर, सोना समान

ज्ञान और विज्ञान से तृप्त आत्मा वाला, कूटस्थ, जितेन्द्रिय योगी, जिसके लिए मिट्टी का ढेला, पत्थर और सोना समान हैं — वह युक्त कहलाता है।