Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 6.7 / 49

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)6.7

6.7
जितात्मनः प्रशान्तस्य परात्मसु समामतिः । शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानावमानयोः ॥ ६-७ ॥
jitātmanaḥ praśāntasya parātmasu samāmatiḥ | śītoṣṇasukhaduḥkheṣu tathā mānāvamānayoḥ || 6-7 ||
— जितात्मा और प्रशान्त के लिए ; — परमात्मा सर्वत्र समबुद्धि से स्थित ; — शीत-उष्ण, सुख-दुःख में ; — वैसे ही मान-अपमान में

जितात्मा और प्रशान्त पुरुष के लिए शीत-उष्ण, सुख-दुःख तथा मान-अपमान में परमात्मा समबुद्धि से स्थित रहता है।