Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 6.9 / 49

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)6.9

6.9
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु । साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥ ६-९ ॥
suhṛnmitrāryudāsīnamadhyasthadveṣyabandhuṣu | sādhuṣvapi ca pāpeṣu samabuddhirviśiṣyate || 6-9 ||
— सुहृद्, मित्र, शत्रु, उदासीन ; — मध्यस्थ, द्वेष्य और बन्धु में ; — साधुओं में भी और पापियों में ; — समबुद्धि वाला श्रेष्ठ है

जो सुहृद्, मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष्य और बन्धु में, तथा साधुओं और पापियों में भी समबुद्धि वाला है — वह श्रेष्ठ है।