Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 6.21 / 49

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)6.21

6.21
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवनात् । यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥ ६-२१ ॥
yatroparamate cittaṃ niruddhaṃ yogasevanāt | yatra caivātmanātmānaṃ paśyannātmani tuṣyati || 6-21 ||
— जहाँ चित्त उपराम हो जाता है ; — योग के सेवन से निरुद्ध ; — और जहाँ आत्मा से आत्मा को ; — देखता हुआ आत्मा में सन्तुष्ट रहता है

जहाँ योग के सेवन से निरुद्ध चित्त उपराम (शान्त) हो जाता है, और जहाँ आत्मा के द्वारा आत्मा को देखता हुआ आत्मा में ही सन्तुष्ट रहता है;