Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 6.22 / 49

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)6.22

6.22
सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् । वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥ ६-२२ ॥
sukhamātyantikaṃ yattad buddhigrāhyamatīndriyam | vetti yatra na caivāyaṃ sthitaścalati tattvataḥ || 6-22 ||
— वह अत्यन्त सुख ; — बुद्धि से ग्राह्य, इन्द्रियों से परे ; — जहाँ वह जानता है और कभी ; — स्थित होकर तत्त्व से विचलित नहीं होता

जहाँ वह उस अत्यन्त सुख को जानता है जो बुद्धि से ग्राह्य और इन्द्रियों से परे है, और जिसमें स्थित होकर यह तत्त्व से कभी विचलित नहीं होता;