Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 6.18 / 49

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)6.18

6.18
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु । युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥ ६-१८ ॥
yuktāhāravihārasya yuktaceṣṭasya karmasu | yuktasvapnāvabodhasya yogo bhavati duḥkhahā || 6-18 ||
— आहार-विहार में नियमित का ; — कर्मों में नियमित चेष्टा वाले का ; — निद्रा-जागरण में नियमित का ; — योग दुःख का नाश करने वाला होता है

आहार और विहार में नियमित, कर्मों में नियमित चेष्टा वाले, और निद्रा-जागरण में नियमित पुरुष का योग दुःख का नाश करने वाला होता है।