Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 6.17 / 49

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)6.17

6.17
योगोऽस्ति नैवात्यशतो न चैकान्तमनश्नतः । न चातिस्वप्नशीलस्य नातिजागरतोऽर्जुन ॥ ६-१७ ॥
yogo'sti naivātyaśato na caikāntamanaśnataḥ | na cātisvapnaśīlasya nātijāgarato'rjuna || 6-17 ||
— योग अधिक खाने वाले का नहीं ; — न बिल्कुल न खाने वाले का ; — न अधिक सोने के स्वभाव वाले का ; — न अधिक जागने वाले का, हे अर्जुन

हे अर्जुन, योग न अधिक खाने वाले का होता है, न बिल्कुल न खाने वाले का, न अधिक सोने के स्वभाव वाले का, और न अधिक जागने वाले का।