Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 6.16 / 49

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)6.16

6.16
युञ्जन्नेवं सदात्मानं मद्भक्तोऽनन्यमानसः । शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥ ६-१६ ॥
yuñjannevaṃ sadātmānaṃ madbhakto'nanyamānasaḥ | śāntiṃ nirvāṇaparamāṃ matsaṃsthāmadhigacchati || 6-16 ||
— इस प्रकार सदा आत्मा को जोड़ता हुआ ; — मेरा भक्त, अनन्य मन वाला ; — निर्वाण में परिणत होने वाली शान्ति ; — जो मुझमें स्थित है, उसे प्राप्त करता है

इस प्रकार सदा आत्मा को जोड़ता हुआ, अनन्य मन वाला मेरा भक्त उस शान्ति को प्राप्त करता है, जो निर्वाण में परिणत होती है और मुझमें स्थित है।