युञ्जन्नेवं सदात्मानं मद्भक्तोऽनन्यमानसः ।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥
६-१६ ॥
yuñjannevaṃ sadātmānaṃ madbhakto'nanyamānasaḥ |
śāntiṃ nirvāṇaparamāṃ matsaṃsthāmadhigacchati ||
6-16 ||
इस प्रकार सदा आत्मा को जोड़ता हुआ, अनन्य मन वाला मेरा भक्त उस शान्ति को प्राप्त करता है, जो निर्वाण में परिणत होती है और मुझमें स्थित है।