Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 6.15 / 49

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)6.15

6.15
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः । मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥ ६-१५ ॥
praśāntātmā vigatabhīrbrahmacārivrate sthitaḥ | manaḥ saṃyamya maccitto yukta āsīta matparaḥ || 6-15 ||
— प्रशान्त आत्मा, भयरहित ; — ब्रह्मचर्य व्रत में स्थित ; — मन संयत करके, मुझमें चित्त लगाकर ; — युक्त बैठे, मेरे परायण

प्रशान्त आत्मा वाला, भयरहित, ब्रह्मचर्य व्रत में स्थित होकर, मन को संयत करके, मुझमें चित्त लगाकर, मेरे परायण होकर युक्त बैठे।