Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 6.14 / 49

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)6.14

6.14
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः । संपश्यन्नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥ ६-१४ ॥
samaṃ kāyaśirogrīvaṃ dhārayannacalaṃ sthiraḥ | saṃpaśyannāsikāgraṃ svaṃ diśaścānavalokayan || 6-14 ||
— शरीर, सिर, ग्रीवा को सम ; — अचल, स्थिर धारण करते हुए ; — अपनी नासिका के अग्र को देखते हुए ; — और दिशाओं को न देखते हुए

शरीर, सिर और ग्रीवा को सम, अचल और स्थिर धारण करते हुए, अपनी नासिका के अग्रभाग को देखते हुए और दिशाओं को न देखते हुए,