Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 5.1 / 29

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)5.1

5.1
संन्यासं कर्मणां कृष्ण ! पुनर्योगं च शंससि । यच्छ्रेयानेतयोरेकस्तं मे ब्रूहि विनिश्चितम् ॥ ५-१ ॥
saṃnyāsaṃ karmaṇāṃ kṛṣṇa ! punaryogaṃ ca śaṃsasi | yacchreyānetayorekastaṃ me brūhi viniścitam || 5-1 ||
— कर्मों का संन्यास, हे कृष्ण ; — और फिर योग की प्रशंसा करते हैं ; — इन दोनों में जो एक श्रेष्ठ ; — वह मुझे निश्चित रूप से बताइए

हे कृष्ण, आप कर्मों के संन्यास की प्रशंसा करते हैं और फिर योग की भी; इन दोनों में से जो एक श्रेष्ठ हो, वह मुझे निश्चित रूप से बताइए।