तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः ।
छित्वैवं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥
४-४२ ॥
tasmādajñānasambhūtaṃ hṛtsthaṃ jñānāsinātmanaḥ |
chitvaivaṃ saṃśayaṃ yogamātiṣṭhottiṣṭha bhārata ||
4-42 ||
अतः हे भारत, अज्ञान से उत्पन्न और हृदय में स्थित इस अपने संशय को आत्मज्ञान-रूपी तलवार से इस प्रकार काटकर, योग का आश्रय लेकर खड़े हो जाओ।