संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ।
तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥
५-२ ॥
saṃnyāsaḥ karmayogaśca niḥśreyasakarāvubhau |
tayostu karmasaṃnyāsātkarmayogo viśiṣyate ||
5-2 ||
संन्यास और कर्मयोग — दोनों ही परम कल्याण करने वाले हैं; किन्तु इन दोनों में कर्म-संन्यास की अपेक्षा कर्मयोग श्रेष्ठ है।