Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 5.2 / 29

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)5.2

5.2
संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ । तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥ ५-२ ॥
saṃnyāsaḥ karmayogaśca niḥśreyasakarāvubhau | tayostu karmasaṃnyāsātkarmayogo viśiṣyate || 5-2 ||
— संन्यास और कर्मयोग ; — दोनों ही परम कल्याण करने वाले ; — किन्तु इन दोनों में कर्म-संन्यास से ; — कर्मयोग श्रेष्ठ है

संन्यास और कर्मयोग — दोनों ही परम कल्याण करने वाले हैं; किन्तु इन दोनों में कर्म-संन्यास की अपेक्षा कर्मयोग श्रेष्ठ है।