Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 5.3 / 29

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)5.3

5.3
ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति । निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो ! सुखं बन्धाद्विमुच्यते ॥ ५-३ ॥
jñeyaḥ sa nityasaṃnyāsī yo na dveṣṭi na kāṅkṣati | nirdvandvo hi mahābāho ! sukhaṃ bandhādvimucyate || 5-3 ||
— उसे नित्य संन्यासी जानना चाहिए ; — जो न द्वेष करता न कामना ; — क्योंकि द्वन्द्वरहित, हे महाबाहु ; — वह सुखपूर्वक बन्धन से मुक्त होता है

जो न द्वेष करता है न कामना करता है, उसे नित्य संन्यासी जानना चाहिए; क्योंकि हे महाबाहु, द्वन्द्वों से रहित वह सुखपूर्वक बन्धन से मुक्त हो जाता है।