साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ।
एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ॥
५-४ ॥
sāṅkhyayogau pṛthagbālāḥ pravadanti na paṇḍitāḥ |
ekamapyāsthitaḥ samyagubhayorvindate phalam ||
5-4 ||
सांख्य और योग को भिन्न-भिन्न बालक (अज्ञानी) कहते हैं, पण्डित नहीं; इनमें से किसी एक में भी भली-भाँति स्थित पुरुष दोनों का फल पा लेता है।