Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 2.8 / 74

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)2.8

2.8
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्या- द्यः शोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् । अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥ २-८ ॥
na hi prapaśyāmi mamāpanudyā- dyaḥ śokamucchoṣaṇamindriyāṇām | avāpya bhūmāvasapatnamṛddhaṃ rājyaṃ surāṇāmapi cādhipatyam || 2-8 ||
— क्योंकि मैं नहीं देखता ; — जो मेरे शोक को दूर कर सके ; — इन्द्रियों को सुखाने वाले ; — पृथ्वी पर निष्कण्टक समृद्ध राज्य पाकर भी ; — अथवा देवताओं का आधिपत्य भी

क्योंकि पृथ्वी पर निष्कण्टक और समृद्ध राज्य पाकर, अथवा देवताओं का आधिपत्य भी पाकर, मेरी इन्द्रियों को सुखाने वाले इस शोक को जो दूर कर सके — ऐसा कुछ मुझे नहीं दिखता।