Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 2.7 / 74

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)2.7

2.7
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः । यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥ २-७ ॥
kārpaṇyadoṣopahatasvabhāvaḥ pṛcchāmi tvāṃ dharmasaṃmūḍhacetāḥ | yacchreyaḥ syānniścitaṃ brūhi tanme śiṣyaste'haṃ śādhi māṃ tvāṃ prapannam || 2-7 ||
— कायरता के दोष से अभिभूत स्वभाव वाला ; — मैं आपसे पूछता हूँ ; — धर्म के विषय में मोहित चित्त वाला ; — जो निश्चित श्रेय हो वह मुझे बताइए ; — मैं आपका शिष्य हूँ, शरणागत मुझे शिक्षा दीजिए

कायरता के दोष से अभिभूत स्वभाव वाला और धर्म के विषय में मोहित चित्त वाला मैं आपसे पूछता हूँ — जो निश्चित रूप से श्रेयस्कर हो वह मुझे बताइए; मैं आपका शिष्य हूँ, मुझ शरणागत को शिक्षा दीजिए।