तानि संयम्य मनसा युक्त आसीत मत्परः ।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥
२-६३ ॥
tāni saṃyamya manasā yukta āsīta matparaḥ |
vaśe hi yasyendriyāṇi tasya prajñā pratiṣṭhitā ||
2-63 ||
उन सब (इन्द्रियों) को मन से संयत करके, युक्त होकर, मेरे परायण होकर बैठे; क्योंकि जिसकी इन्द्रियाँ वश में हैं उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित है।