Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 2.63 / 74

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)2.63

2.63
तानि संयम्य मनसा युक्त आसीत मत्परः । वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ २-६३ ॥
tāni saṃyamya manasā yukta āsīta matparaḥ | vaśe hi yasyendriyāṇi tasya prajñā pratiṣṭhitā || 2-63 ||
— उन्हें मन से संयत करके ; — युक्त होकर, मेरे परायण होकर बैठे ; — क्योंकि जिसकी इन्द्रियाँ वश में ; — उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित है

उन सब (इन्द्रियों) को मन से संयत करके, युक्त होकर, मेरे परायण होकर बैठे; क्योंकि जिसकी इन्द्रियाँ वश में हैं उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित है।