Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 2.62 / 74

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)2.62

2.62
यत्तस्यापि हि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः । इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥ २-६२ ॥
yattasyāpi hi kaunteya puruṣasya vipaścitaḥ | indriyāṇi pramāthīni haranti prasabhaṃ manaḥ || 2-62 ||
— किन्तु, हे कुन्तीपुत्र, उसका भी ; — विवेकी पुरुष का (मन) ; — क्षोभ उत्पन्न करने वाली इन्द्रियाँ ; — बलपूर्वक मन को हर ले जाती हैं

हे कुन्तीपुत्र, यत्न करने वाले विवेकी पुरुष का भी मन क्षुब्ध करने वाली इन्द्रियाँ बलपूर्वक हर ले जाती हैं।