विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥
२-६१ ॥
viṣayā vinivartante nirāhārasya dehinaḥ |
rasavarjaṃ raso'pyasya paraṃ dṛṣṭvā nivartate ||
2-61 ||
निराहार रहने वाले देही से विषय निवृत्त हो जाते हैं, किन्तु रस (आसक्ति) शेष रहती है; परम तत्त्व को देख लेने पर इसका वह रस भी निवृत्त हो जाता है।