Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 2.61 / 74

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)2.61

2.61
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः । रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥ २-६१ ॥
viṣayā vinivartante nirāhārasya dehinaḥ | rasavarjaṃ raso'pyasya paraṃ dṛṣṭvā nivartate || 2-61 ||
— विषय निवृत्त हो जाते हैं ; — निराहार देही के ; — रस (आसक्ति) को छोड़कर ; — परम तत्त्व देखकर इसका रस भी निवृत्त हो जाता है

निराहार रहने वाले देही से विषय निवृत्त हो जाते हैं, किन्तु रस (आसक्ति) शेष रहती है; परम तत्त्व को देख लेने पर इसका वह रस भी निवृत्त हो जाता है।