Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 2.60 / 74

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)2.60

2.60
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यः स्थिरप्रज्ञस्तदोच्यते ॥ २-६० ॥
yadā saṃharate cāyaṃ kūrmo'ṅgānīva sarvaśaḥ | indriyāṇīndriyārthebhyaḥ sthiraprajñastadocyate || 2-60 ||
— और जब यह समेट लेता है ; — कछुए के समान अंगों को सब ओर से ; — इन्द्रियों को विषयों से ; — तब वह स्थिरप्रज्ञ कहलाता है

और जब यह पुरुष कछुए की भाँति अपने अंगों को सब ओर से समेट लेता है, अर्थात् इन्द्रियों को विषयों से खींच लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर कही जाती है।