यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यः स्थिरप्रज्ञस्तदोच्यते ॥
२-६० ॥
yadā saṃharate cāyaṃ kūrmo'ṅgānīva sarvaśaḥ |
indriyāṇīndriyārthebhyaḥ sthiraprajñastadocyate ||
2-60 ||
और जब यह पुरुष कछुए की भाँति अपने अंगों को सब ओर से समेट लेता है, अर्थात् इन्द्रियों को विषयों से खींच लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर कही जाती है।